"ईमानदारी का अवलंबन ही श्रेयस्कर

2012-07-28 09:07 AM को जीवन-निर्माण पर प्रकाशित

 

थोड़ी देर के लिए यह मान भी लिया जाए कि ईमानदारी से बेईमानी की तुलना में कमाई कम होती है, तो भी अपनी चिरस्थायी विशेषताओं के कारण आर्थिक दृष्टिकोण से भी ईमानदारी का अवलंबन ही श्रेयस्कर है। पसीने की कमाई ही फलती फूलती है, हराम का पैसा पानी के बबूले की तरह नष्ट हो जाता है। अपने साथ पश्चाताप, संताप और अपयश छोड़ जाता है। यदि बेईमानी से अधिक उपार्जन होता भी हो तो आवश्यक नहीं कि धनवान सेठ बन जाए। धन की तुलना में सद्गुणों की पूँजी कहीं अधिक मूल्यवान है। धन ही सब कुछ होता तो महापुरुष सद्गुणों की संपदा एकत्रित करने में अपने जीवन को क्यों खपाते ? त्याग बलिदान का आदर्श क्यों प्रस्तुत करते ? अपनी प्रामाणिकता अक्षुण्ण रखने के लिए बड़ी से बड़ी कुर्बानी क्यों देते ? स्पष्ट है कि नीति पर चलने से मिलने वाला आंतरिक संतोष, लोक श्रद्धा एवं सम्मान धन की तुलना में कहीं अधिक कीमती और स्थायी है। जिसे पाने के लिए विपुल संपदा को भी न्यौछावर किया जा सकता है।

बेईमानी को उन्नति के आदर्श के रूप में स्वीकार कर लेने से न तो व्यक्ति की प्रगति संभव है और न ही समाज की। इस प्रचलित भ्रांत धारणा को कि ईमानदारी घाटे का सौदा है तथा बेईमानी लाभ का - जितना शीघ्र निरस्त किया जा सके, उतना ही श्रेयस्कर है।

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