दलित बच्चों के साथ शिक्षा में भेदभाव एक सामाजिक त्रासदी: जूठन फिल्म के लेखक-निर्देशक पुष्पेंद्र आल्बे

दलित बच्चों के साथ शिक्षा में भेदभाव एक सामाजिक त्रासदी: जूठन फिल्म के लेखक-निर्देशक पुष्पेंद्र आल्बे
दलित बच्चों के साथ शिक्षा में भेदभाव एक सामाजिक त्रासदी: जूठन फिल्म के लेखक-निर्देशक पुष्पेंद्र आल्बे
दलित बच्चों के साथ शिक्षा में भेदभाव एक सामाजिक त्रासदी: जूठन फिल्म के लेखक-निर्देशक पुष्पेंद्र आल्बे
दलित बच्चों के साथ शिक्षा में भेदभाव एक सामाजिक त्रासदी: जूठन फिल्म के लेखक-निर्देशक पुष्पेंद्र आल्बे
दलित बच्चों के साथ शिक्षा में भेदभाव एक सामाजिक त्रासदी: जूठन फिल्म के लेखक-निर्देशक पुष्पेंद्र आल्बे

ऐसे दौर में जबकि पिछले कुछ वर्षों में बॉलीवुड लगातार नग्नता, हिंसा, सेक्स और प्रोपेगैंडा वाली फिल्में परोस रहा है, युवा फिल्मकार पुष्पेंद्र आल्बे की आगामी फिल्म जूठन शिक्षा में जातिगत भेदभाव जैसे जरूरी मुद्दे को उठाती है. बतौर लेखक पुष्पेंद्र आल्बे की पिछली फिल्म सैक्टर बालाकोट, जिसमें विपुल गुप्ता, अश्मित पटेल और महाभारत में दुर्योधन की कालजयी भूमिका निभाने वाले पुनीत इस्सर जैसे बडे सितारे थे, भी आतंकवाद की असल वजह को उजागर करती है!

जूठन की 29 दिन की शूटिंग अगस्त महीने में मध्यप्रदेश की वास्तविक लोकेशन पर की गई और फिलहाल पोस्ट-प्रोडक्शन स्टेज में है. संजीदा अभिनय के लिए विख्यात देवेश रंजन की मुख्य भूमिका वाली जूठन का निर्माण पुष्पेंद्र आल्बे और निकिल प्रणव आर की कंपनी एडाप्ट ए स्कूल फिल्म्स ने किया है. फिल्म में नरेश कुमार (बाहुबली फ्रेंचाइजी फेम), विक्रम सिंह (भाग मिल्खा भाग, मिर्जियाॅ फेम), कुलदीप कुमार, संदीप गुप्ता, रिमझिम राजपूत और दिनेश शर्मा (इश्कियां, तनु वेड्स मनु और कागज फेम) भी अहम् भूमिकाओं में नजर आएंगे.

समाज के लिए बेहद जरूरी इस फिल्म को लेकर पुष्पेंद्र आल्बे की खबर इंडिया से बातचीत के संपादित अंश:


जूठन फिल्म बनाने का विचार कैसे आया?

असल में इस साल मई-जून में मेरी ही लिखी एक अन्य कहानी पर फिल्म बनाने की योजना थी. वो कहानी भी ग्रामीण भारत में प्राथमिक शिक्षा पर ही आधारित थी. लेकिन कुछ स्वास्थ्य वजहों से वो फिल्म नहीं बन पाई, क्योंकि कहानी के अनुसार उसकी शूटिंग गर्मी में ही करनी थी. और तभी मेरे दिमाग में जूठन फिल्म का आईडिया आया. जब फिल्म की कहानी लिखी तो वो इतनी जबरदस्त बनी कि मैने तत्काल ही उस पर फिल्म बनाने का फैसला कर लिया.


फिल्म का नाम जूठन रखने की कोई खास वजह?

असल में हमारी फिल्म ये दिखाती है कि ग्रामीणभारत में ऊपरी तबके के बच्चों को जो शिक्षा मिल रही है, दलित, निचले तबके के बच्चों को उसका सिर्फ जूठन ही नसीब हो रहा है. हम भले ही सबके लिए समान शिक्षा के दावे करते हों, लेकिन कड़वी हकीकत यह है कि जातिगत भेदभाव अभी भी समाज को खोखला कर रहा है, खासकर ग्रामीण भारत में. इससे भी ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण बात यह कि दलित समाज के बच्चों की शिक्षा इस जातिगत भेदभाव की वजह से हाशिए पर है.


क्या असल में जातिगत भेदभाव और छुआछूत अभी भी हमारे देश में देखने को मिलता है?

बेशक! मैं अपनी फिल्म की कहानी की रिसर्च के दौरान कुछ चौंकाने वाले तथ्यों से रूबरू हुआ. जैसे - आॅक्सफाम की रिपोर्ट के मुताबिक देश में स्कूल छोड़ने वाले एससी-एसटी और ओबीसी तबके के बच्चों की संख्या अन्य तबकों से कहीं ज्यादा है. स्कूल बीच में ही छोड़ देने वाले 60 लाख बच्चों में से 75 फीसदी बच्चे दलित या आदिवासी हैं. 

हालांकि मैं यह भी ईमानदारी से स्वीकार करूँगा कि शहरी भारत में जातिगत भेदभाव और छुआछूत लगभग खत्म हो चुका है. लेकिन एक सच यह भी है कि गाँवों में यह आज भी बडे पैमाने पर फैला हुआ है. अगर आप गूगल में सर्च करें तो पता चलता है कि देश के हर कोने में अक्सर ऐसी खबरें हेडलाइन्स बनती है कि दलित बच्चों को कक्षा में अलग बिठाया गया, मिड डे मिल में उनके साथ भेदभाव किया गया, उनके बर्तनों को स्कूल के कर्मचारियों द्वारा साफ करने से इंकार कर दिया. जब तक दलित समाज के खिलाफ इस तरह की मानसिकता को खत्म नहीं किया जाता, सबके लिए समान शिक्षा एक मुहावरे से ज्यादा कुछ नहीं है.

 

तो फिर फिल्म जूठन इस मुद्दे को किस तरह सामने लाती है?

जूठन इसी मुद्दे पर बात करती है कि शिक्षा पर सबका बराबर अधिकार है. दलित समाज के बच्चों को सिर्फ इसलिये शिक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे निचले तबके के हैं. दलित और निचले तबके को भी दुर्भावनामुक्त समान शिक्षा मुहैया सुनिश्चित करके ही उन्हें समाज की मुख्य धारा से जोड़ा जा सकता है. इसके लिए छुआछूत को जड से खत्म करना होगा. शिक्षा में ये छूआछूत हमारे देश के एक वैश्विक महाशक्ति बनने में सबसे बडी रूकावट है. एक हैरान करने वाला तथ्य यह भी है कि देश की प्राथमिक स्कूलों में पांच में से चार महिला शिक्षक ऊपरी तबके के हैं. इसी तरह हर पांच में से एक पुरूष शिक्षक भी ऊपरी तबके से है. इसके चलते अगर दलित समाज के बच्चें पढने का जज्बा भी दिखाते हैं, तो भी उनके अरमानों और हौसलों को कुचल दिया जाता है!

 

लेकिन समाज से जातिगत भेदभाव और छुआछूत मिटाने की दिशा में पिछले कुछ दशकों में सरकारों ने भी प्रयास किए हैं?

 बेशक पिछले कुछ सालों में सरकारें जातिगत भेदभाव और छुआछूत के जड से खात्में के लिए प्रतिबद्ध रही है. लेकिन असल दिक्कत निचले स्तर पर है.  आप गूगल सर्च करें तो पता चल जाएगा कि दलित बच्चों के साथ जातिगत भेदभाव में सबसे बडी भूमिका शिक्षक ही निभाते हैं, जो अधिकतर मौकों पर ऊपरी तबके से संबंध रखते हैं. इससे भी ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि ऐसे मामलों को अक्सर दबा दिया जाता हैं, क्योंकि बडे पदों पर बैठे हुए अधिकारी भी ऊपरी तबके से ही ताल्लुक रखते हैं. 

 

फिल्म में मुख्य भूमिका निभाने वाले देवेश रंजन के चयन की कोई खास वजह?

असल में सिर्फ जूठन की कहानी ही नहीं, इस पूरे प्रोजेक्ट के बनने में भी सबसे मुख्य भूमिका देवेश जी की है. फिल्म की कास्टिंग से लेकर टेक्नीशियन और अन्य सभी मामलों में भी देवेश जी का सहयोग अकल्पनीय रहा है! उनको फिल्म में मुख्य भूमिका के लिए कास्ट करते वक्त मुझे विश्वास था कि वो इस रोल के लिए सबसे उपयुक्त हैं. अब जब फिल्म की शूटिंग हो चुकी है और पोस्ट प्रोडक्शन स्टेज में है, मैं यह बेहिचक कह सकता हूँ कि उनका जुड़ना इस फिल्म के लिए सबसे अच्छी बात रही! बतौर लेखक मैने कई बडे कलाकारों के साथ काम किया है.  मेरी पिछली फिल्म सैक्टर बालाकोट में ही एक नहीं, तीन-तीन बडे कलाकार थे. लेकिन देवेश जी के साथ काम करने का एक अलग ही अनुभव रहा. एक निर्माता-निर्देशक के लिए उसके कलाकारों का समर्पित होना सबसे ज्यादा जरूरी है, और इस मामले में देवेश जी को दस में से दस नंबर दिए जा सकते हैं!