घर अपना ही घर होता है

2012-05-25 08:52 AM को गजलें पर प्रकाशित

 

घर अपना ही घर होता है
          वैसा कहां किधर होता है|
 
          शुद्ध हवा पानी मिल जाये
          ऐसा कहाँ शहर होता है|
 
           लाख बार धो धो कर देखो
            फिर भी जहर जहर होता है|
 
            चापलूस और मक्कारों का
            अक्सर मीठा स्वर होता है|
 
            रब ने जिसे बनाया होगा
            वही वधु का वर होता है|    
प्रभुदयाल श्रीवास्तव

लेखक/रचनाकार: प्रभुदयाल श्रीवास्तव

शिक्षा वैद्युत यांत्रिकी में पत्रोपाधि, लेखन विगत दो दशकों से अधिक समय से कहानी ,कवितायें व्यंग्य ,लघु कथाएं लेख, बुंदेली लोकगीत,बुंदेली लघु कथाए,बुंदेली गज़लों का लेखन‌, प्रकाशन लोकमत समाचार नागपुर में तीन वर्षों तक व्यंग्य स्तंभ तीर तुक्का, , रंग बेरंग में प्रकाशन,दैनिक भास्कर ,नवभारत,अमृत संदेश, जबलपुर एक्सप्रेस,पंजाब केसरी,एवं देश के लगभग‌ सभी हिंदी समाचार पत्रों में व्यंग्योँ का प्रकाशन, कविताएं बालगीतों क्षणिकांओं का भी प्रकाशन हुआ|पत्रिकाओं में भी कई रचनाएं प्रकाशित

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