डॉ.वेद व्यथित की रचनाएं/लेख
नजर बनाये रहिये
2012-06-25 03:10 PM को व्यंग्य पर प्रकाशित
देश की राजधानी में बड़ी घटना घटित हो गई एक बड़े नेता जी फंस गये तो हंगामा भी बड़ा ही होना था और जब हंगामा होना है तो फिर टी वि चैनलवाले भला कहाँ पीछे रहने वाले थे वैसे भी यह तो बड़ा हंगामा था जब कि ये तो छोटे २ हंगामे को भी बड़ा तूफ़ान बना सकते हैं या बना देते हैं परन्तु कए करें कमबख्त समय भी बेवफा प्रेमिका से कम थोड़ी…
[ लेखक : डॉ.वेद व्यथित ]
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महान प्रजाति कुत्ता जी
2012-05-06 05:00 PM को व्यंग्य पर प्रकाशित
'स्वानों को मिलता दूध वस्त्र 'ये पंक्तियाँ महान राष्ट्रिय कवि की है किसी आम देशज या गली मौहल्ले के कवि की नही हैं | इसी लिए ही स्वानों के बारे में हैं यानि राष्ट्रीय स्वानों के बारे में हैं क्यों कि इन का भाग्य आम गली के कुत्तों से भिन्न होता है इसी लिए तो स्वान हैं , कुत्ते नही हैं | कुत्ते तो गली मौहल्ले में मिलते हैं जिन को कोई धर्म भीरू…
[ लेखक : डॉ.वेद व्यथित ]
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सहायता और धन्यवाद
2012-04-16 09:28 AM को व्यंग्य पर प्रकाशित
मेरे मित्र भरोसे का छोरा शहर में नौकरी पर लग गया | नौकरी क्या लगी उस की तो चल ढल तो बदली ही अपितु हव भाव भी बदल गये और यहाँ तक की उस का हुलिया तक बदल गया | शहर जाने से पहले जो भी कोई उसे मिल जाता वह सब का राम २ कह कर अभिवादन करता था | भरोसे लाल के मन को बड़ा चैन मिलता था कि बेटा भी तो…
[ लेखक : डॉ.वेद व्यथित ]
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नाक यानि नाक मतलब नाक
2012-04-09 02:08 PM को व्यंग्य पर प्रकाशित
नाक जी हाँ नाक मतलब नाक यानि नाक का मतलब नाक नही अपितु नाक नाक है ,जी हाँ ,आम आदमी एक तरफ है और नाक एक तरफ है तो क्या यह आदमी से अलग है | है तो पर चिपकी भी आदमी से ही अच्छी तरह ही ही है अलग भी नही है और यदि अलग हो गई तो बस समझो बड़ी मुश्किल हो जाएगी |युद्ध हो जाता है हजारों वानर भालू इसी नाक…
[ लेखक : डॉ.वेद व्यथित ]
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भगवान श्री राम जी के चरणों में श्रद्धा पूर्वक निवेदन है
2012-04-09 01:38 PM को कविताएं पर प्रकाशित
किस ने देखा राम हृदय की घनीभूत पीड़ा को
कह भी जो न सके किसी से उस गहरी पीड़ा को
क्या ये सब करुणा के बदले मिली राम के मन को
आदर्शों पर चल कर ही तो पाया इस पीड़ा को ||
मन करता राम तुम्हारे दुःख का अंश चुरा लूं
पहले ही क्या कम दुःख झेले कैसे तुम्हे पुकारूँ
फिर भी तुम करुणा निधन ही बने हुए हो अब भी
पर…
[ लेखक : डॉ.वेद व्यथित ]
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मार्ग दर्शन
2012-02-22 02:50 PM को व्यंग्य पर प्रकाशित
एक स्कूल का वार्षिक उत्सव होना था |स्कूल मतलब प्राइवेट स्कूल क्यों कि सरकारी स्कूलोंमे तो ऐसी बातें होती ही नही है क्यों कि वहाँ तो रोज आधी छुट्टी में वार्षिक उत्सव हो जाता है परन्तु प्राइवेट स्कूलों को साल भर में यह कार्य कर्म करना ही पड़ता है क्यों कि यह कार्यक्रम के साथ २ उन की एड्वर्स्तैमेंट का यानि प्रचार का अच्छा माध्यम भी होता है और कमाई का भी क्यों…
[ लेखक : डॉ.वेद व्यथित ]
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